SIR विवाद पर सियासी घमासान, राहुल-केजरीवाल-अखिलेश ने EC पर उठाए सवाल
SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सियासी घमासान तेज हो गया है। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, जबकि चुनाव आयोग ने अंदरूनी मतभेद की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों को लेकर कथित मतभेदों की एक मीडिया रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन मतभेदों की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। वीडियो में उन्होंने मतदाता सूची और वोट से जुड़े मुद्दे को लोकतांत्रिक प्रक्रिया तथा संविधान से जोड़ते हुए कहा कि वोट की चोरी भारत के लोगों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला है। उन्होंने बीजेपी, आरएसएस और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भविष्य में कार्रवाई होगी।
राहुल गांधी ने अपने बयान में चुनाव आयोग और चुनाव अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा, "आप जो कर रहे हो, गलत कर रहे हो... ये देश के खिलाफ है। ये मत भूलिए, टाइम आएगा, हम आपको पकड़ेंगे। ये राजद्रोह है।" यह बयान SIR को लेकर सामने आई उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें चुनाव आयोग के दो सदस्यों की ओर से कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।
केजरीवाल ने दिल्ली और हरियाणा के चुनाव रद्द करने की मांग की
आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। उन्होंने मीडिया में सामने आई रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति के जरिए चुनाव आयोग को नहीं चलाया जा सकता। केजरीवाल ने दिल्ली और हरियाणा के चुनाव रद्द किए जाने की मांग की और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी तथा उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग भी की।
हालांकि, केजरीवाल की यह मांग एक राजनीतिक नेता की मांग के रूप में सामने आई है। चुनाव आयोग की ओर से ऐसा कोई निर्णय घोषित नहीं किया गया है कि दिल्ली या हरियाणा के चुनाव रद्द किए जा रहे हैं। SIR की प्रक्रिया और मतदाता सूची से संबंधित विवादों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दल अपनी-अपनी आपत्तियां और मांगें रख रहे हैं।
अखिलेश यादव ने भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग के अधिकारियों की ओर से सिर्फ 10 महीनों में 14 बार आधिकारिक नोटों में मुद्दे उठाए गए, तो इससे यह सवाल पैदा होता है कि आयोग किसके इशारे पर काम कर रहा था। अखिलेश यादव ने इसे लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह बताते हुए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए।
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक संस्था के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि इस तरह की प्रक्रिया के जरिए चुनाव कराए गए हैं तो उन चुनावों से बनी सरकारों की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठते हैं। ये अखिलेश यादव द्वारा व्यक्त किए गए राजनीतिक आरोप और सवाल हैं।
सिंघवी ने कहा- CEC ने सहयोगियों को भी भ्रमित किया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने केवल देश को ही नहीं, बल्कि अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों को भी भ्रमित किया। सिंघवी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि आयोग की संस्थागत व्यवस्था को प्रभावित किया गया है।
क्या है चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की रिपोर्ट?
इस पूरे विवाद की शुरुआत द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट से हुई, जिसमें दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी- के बीच SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर असहमति थी। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम जोड़ने और हटाने, वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची से जुड़े डेटाबेस और SIR के दौरान लिए गए कुछ फैसलों से संबंधित थीं। कुछ मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि उनके अनुसार उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम से फैसले और आदेश कैसे जारी किए गए।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस के प्रबंधन और उसके एक्सेस को लेकर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत होने और राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच से जुड़े मुद्दे उठाए। कुछ मामलों में उन्होंने चुनावी डेटा से जुड़े तकनीकी और प्रशासनिक प्रबंधन पर भी आपत्ति दर्ज की।
फॉर्म-6 को लेकर भी उठे सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई। फॉर्म-6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इसमें SIR से जुड़े पुराने मतदाता रिकॉर्ड को लेकर अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कथित तौर पर सवाल उठाया था कि नियमों में संशोधन के बिना वैधानिक फॉर्म में इस तरह बदलाव किया जा सकता है या नहीं। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस मुद्दे पर आपत्ति दर्ज की थी।
पश्चिम बंगाल में SIR और अपील का मुद्दा
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से जुड़े मामलों और अपील प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से ज्यादा ने नाम बहाल कराने के लिए अपील दायर की है। कुल मिलाकर 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें 22.21 लाख अपीलें नाम बहाल करने के लिए और 16.10 लाख अपीलें कुछ मतदाताओं को हटाने की मांग से जुड़ी थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी अपीलों को लेकर भी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाए थे। उन्होंने कथित तौर पर पूछा कि कुछ अपीलें चुनाव आयोग की ओर से किसके अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत दाखिल की गईं। यह भी दावा किया गया कि इस प्रक्रिया की जानकारी सभी संबंधित अधिकारियों को नहीं थी।
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट को किया खारिज
विपक्षी नेताओं के आरोपों और मीडिया रिपोर्ट के बीच चुनाव आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि आयोग के भीतर SIR को लेकर किसी तरह का संस्थागत मतभेद नहीं है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की मंजूरी से SIR से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
चुनाव आयोग के सूत्रों ने यह भी कहा कि अलग-अलग मुद्दों पर चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की व्यक्तिगत राय अलग हो सकती है, लेकिन आयोग के औपचारिक फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यानी मीडिया रिपोर्ट में जिन लिखित आपत्तियों का उल्लेख किया गया है, आयोग का आधिकारिक पक्ष यह है कि उनसे SIR के अंतिम निर्णयों में किसी तरह का संस्थागत मतभेद साबित नहीं होता।
SIR को लेकर बढ़ी राजनीतिक बहस
SIR का मुद्दा अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है और इसे लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग लगातार प्रक्रिया को लेकर अपनी सफाई दे रहा है। ऐसे में विवाद का एक प्रमुख केंद्र यह है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और चुनाव आयोग के भीतर लिए गए निर्णयों की जानकारी तथा मंजूरी की प्रक्रिया किस तरह काम करती है।
इस बीच, दिल्ली में SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं को अपने रिकॉर्ड और पात्रता से संबंधित जानकारी सत्यापित करने के लिए नोटिस भी जारी किए गए हैं। चुनाव अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि SIR का नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मतलब नहीं है। संबंधित मतदाता को दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराने का अवसर दिया जाता है।
इस पूरे विवाद में फिलहाल तीन अलग-अलग पक्ष सामने हैं। एक तरफ विपक्षी नेता SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, दूसरी तरफ मीडिया रिपोर्ट में चुनाव आयोग के दो सदस्यों की लिखित आपत्तियों का उल्लेख किया गया है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि उसके सभी औपचारिक फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसलिए SIR को लेकर आगे होने वाली प्रशासनिक, राजनीतिक और न्यायिक कार्यवाही इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।
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