नेपाल में जलप्रलय की असली वजह क्या? भूकंप नहीं, ग्लेशियर टूटने से बनी ‘मौत की झील’ ने मचाई तबाही

ग्लेशियर-बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा टूटकर ल्हेंडे नदी में गिरा, जिससे नदी का बहाव कुछ समय के लिए रुक गया।

Aug 28, 2026 - 12:57
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नेपाल में जलप्रलय की असली वजह क्या? भूकंप नहीं, ग्लेशियर टूटने से बनी ‘मौत की झील’ ने मचाई तबाही

नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त 2026 को भोटे कोशी नदी में आई अचानक बाढ़ ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया। देखते ही देखते नदी का पानी, मलबा और बड़े-बड़े पत्थर बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर बढ़े और रास्ते में आने वाले पुल, सड़कें, घर, बिजली परियोजनाएं और दूसरी बुनियादी सुविधाएं तबाह हो गईं। इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय के 27 अगस्त के अपडेट के मुताबिक, नदी क्षेत्रों से 359 शव बरामद किए जा चुके थे और 33 देशों के 596 लोग अभी भी लापता बताए गए थे। बचाव और राहत अभियान लगातार जारी है।

आखिर नेपाल में इतनी भयावह बाढ़ आई कैसे?

शुरुआत में इस प्राकृतिक आपदा को लेकर कई तरह की आशंकाएं सामने आईं। सबसे पहले सवाल उठा कि क्या इलाके में कोई भूकंप आया था? क्या किसी ग्लेशियर के टूटने से अचानक पानी का सैलाब आया? या फिर किसी ग्लेशियल झील के फटने यानी Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) की वजह से यह तबाही हुई? शुरुआती रिपोर्टों में इन सभी संभावनाओं पर जांच चल रही थी, लेकिन अब तक सामने आए सैटेलाइट, भूकंपीय और मैदानी आंकड़े इस ओर इशारा कर रहे हैं कि इस आपदा के पीछे सबसे अहम भूमिका बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर टूटकर नीचे गिरने यानी आइस-रॉक एवलांच/ग्लेशियल कोलैप्स की रही।

अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थान ICIMOD और नेपाल तथा चीन के विशेषज्ञ इस घटना का अध्ययन कर रहे हैं। ICIMOD के शुरुआती आकलन के अनुसार, ऊंचाई वाले इलाके से भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानों का मलबा ल्हेंडे खोला नदी में गिरा होगा। यह नदी भोटे कोशी नदी की सहायक नदी है। इस मलबे ने नदी का रास्ता कुछ समय के लिए रोक दिया, जिससे वहां पानी जमा होने लगा और एक अस्थायी मलबा-बांध या झील जैसी स्थिति बन गई। बाद में जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटा, तो जमा हुआ पानी, कीचड़, बर्फ और विशाल चट्टानों का मलबा एक साथ बेहद तेज गति से नीचे की ओर बह निकला।

सैटेलाइट तस्वीरों ने खोला तबाही का राज

इस घटना को समझने में सैटेलाइट तस्वीरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। चीन से प्राप्त शुरुआती सैटेलाइट तस्वीरों में भोटे कोशी की दिशा में नदी के रास्ते में भारी मलबा जमा होने के संकेत मिले। काठमांडू पोस्ट के अनुसार, यह अवरोध मितेरी पुल से करीब 20 किलोमीटर ऊपर की ओर बना था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा नदी में गिरा और उसने कुछ समय के लिए पानी को रोक दिया। इसके बाद अस्थायी मलबा-बांध टूटने पर अचानक आई बाढ़ ने नीचे की ओर भारी तबाही मचाई।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS ने भी सैटेलाइट तस्वीरों और भूकंपीय आंकड़ों का विश्लेषण किया है। USGS के मुताबिक, घटना से पैदा हुई भूकंपीय ऊर्जा का स्रोत लैंगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तर की ओर स्थित एक ग्लेशियर्ड पर्वतीय चट्टान क्षेत्र में पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियर के टूटने से पैदा हुई ऊर्जा लगभग 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी। इसका मतलब यह है कि जमीन में दर्ज हुआ कंपन वास्तविक भूकंप के कारण नहीं, बल्कि ग्लेशियर और मलबे के बड़े पैमाने पर टूटने से पैदा हुआ था।

तो क्या वहां भूकंप आया ही नहीं था?

यही इस पूरी घटना का सबसे बड़ा भ्रम है। शुरुआती तौर पर अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया था। यह घटना तिब्बत में गोसाईंकुंडा से करीब 47 किलोमीटर उत्तर में दर्ज की गई थी। इसलिए शुरुआती अनुमान में यह संभावना जताई गई कि शायद भूकंप ने पहाड़ की बर्फ और चट्टानों को अस्थिर किया और इसके बाद एवलांच आया।

लेकिन बाद में USGS ने अतिरिक्त भूकंपीय स्टेशनों के आंकड़ों, लंबी अवधि वाली भूकंपीय तरंगों और सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण के बाद निष्कर्ष बदला गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि दर्ज हुई भूकंपीय ऊर्जा किसी सामान्य टेक्टोनिक भूकंप से नहीं, बल्कि ग्लेशियल कोलैप्स और उसके बाद हुए मलबे के बहाव से पैदा हुई थी। इस घटना को बाद में 5.2 तीव्रता के बराबर भूकंपीय ऊर्जा वाले ग्लेशियल कोलैप्स के रूप में समझा गया।

हालांकि, वैज्ञानिक इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं कि कोई छोटा भूकंपीय झटका पहाड़ के अस्थिर हिस्से को ट्रिगर करने में भूमिका निभा सकता था। काठमांडू यूनिवर्सिटी के जलवायु शोधकर्ता और प्रोफेसर रिजन भक्त कायस्थ ने भी कहा कि लगभग उसी समय भूकंपीय गतिविधि दर्ज हुई थी, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उस गतिविधि ने एवलांच को शुरू करने में कोई भूमिका निभाई थी या नहीं। इसलिए भूकंप और ग्लेशियर टूटने के बीच संभावित संबंध की जांच अभी जारी है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक सबसे संभावित घटनाक्रम क्या था?

अब तक मिले सबूतों को जोड़कर देखें तो घटनाक्रम कुछ इस तरह समझा जा रहा है। सबसे पहले लैंगटांग लिरुंग क्षेत्र के ऊंचाई वाले हिस्से में ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान का बड़ा हिस्सा अस्थिर होकर नीचे गिरा। इसके साथ भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे आया। यह मलबा ल्हेंडे खोला में पहुंचा और नदी का रास्ता रोक दिया। नदी का बहाव रुकने से पीछे की ओर पानी जमा होने लगा और एक अस्थायी मलबा-बांध वाली झील बन गई। कुछ समय बाद यह प्राकृतिक अवरोध टूट गया और जमा हुआ पानी तथा भारी मलबा अचानक नीचे की ओर निकल पड़ा। इसी तेज बहाव ने भोटे कोशी और आगे त्रिशूली नदी तंत्र में विनाशकारी बाढ़ की लहर पैदा की।

इस घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ICIMOD के हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों के अनुसार, गल्छी में त्रिशूली नदी का जलस्तर महज 30 मिनट में करीब 9 मीटर तक बढ़ गया, जबकि मलेखु में इसी अवधि में जलस्तर लगभग 7 मीटर बढ़ा। इतनी कम अवधि में पानी के स्तर में इतनी बड़ी वृद्धि इस बात का संकेत है कि यह सामान्य बारिश से पैदा हुई बाढ़ नहीं बल्कि अत्यंत तेज फ्लैश फ्लड और मलबा-प्रवाह था।

क्या ग्लेशियल झील भी फटी थी?

शुरुआत में ग्लेशियल झील के फटने की संभावना को भी गंभीरता से लिया गया था। इसे GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood कहा जाता है। जब किसी ग्लेशियर के सामने या ऊपर बनी झील में अचानक पानी की मात्रा बढ़ जाती है और उसका प्राकृतिक बांध टूट जाता है, तो लाखों-करोड़ों घनमीटर पानी एक साथ नीचे की ओर बह सकता है। हिमालय जैसे ऊंचे और खड़ी ढलानों वाले क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं बेहद विनाशकारी हो सकती हैं।

हालांकि, मौजूदा जांच में सीधे तौर पर किसी बड़ी ग्लेशियल झील के फटने की तुलना में आइस-रॉक एवलांच और उसके बाद नदी में बने अस्थायी मलबा-बांध के टूटने की संभावना ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है। फिर भी वैज्ञानिक इस पहलू की जांच कर रहे हैं और पूरी घटना की अंतिम तस्वीर सामने आने में अभी समय लग सकता है। ICIMOD के विशेषज्ञों ने भी कहा है कि उपलब्ध आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करने में एक से दो सप्ताह और लग सकते हैं।

पिछले साल भी इसी इलाके में आई थी ऐसी बाढ़

इस घटना को समझने के लिए यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि भोटे कोशी नदी और ल्हेंडे खोला क्षेत्र पहले भी अचानक बाढ़ का सामना कर चुका है। 8 जुलाई 2025 को इसी इलाके में भोटे कोशी नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया था। उस समय नेपाल के जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग ने इसे नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ल्हेंडे नदी में ग्लेशियल झील के फटने से जुड़ी घटना माना था। यानी इस क्षेत्र में ग्लेशियर, बर्फ, चट्टान और नदी के बीच बनने वाली ऐसी जटिल प्राकृतिक घटनाओं का जोखिम पहले से मौजूद रहा है।

ICIMOD और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम से जुड़ी एक स्टडी में नेपाल, भारत और तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों में 3,624 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी। इनमें से 47 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना गया, जिनमें 21 झीलें नेपाल में स्थित हैं। इसका अर्थ है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों और उनसे जुड़े अचानक बाढ़ के खतरे को लेकर पहले से ही गंभीर चिंता मौजूद है।

ICIMOD ने क्या कहा?

ICIMOD के रिमोट सेंसिंग और जियो-इन्फॉर्मेशन विशेषज्ञ सार्थक श्रेष्ठ के अनुसार, अब तक उपलब्ध सबूत नेपाल की तरफ हुए एवलांच को इस आपदा का मुख्य ट्रिगर बताते हैं। उनका आकलन है कि स्याफ्रुबेसी के ऊपर आए एवलांच ने नदी का रास्ता रोक दिया और उसके बाद बाढ़ की विनाशकारी लहर नीचे की ओर चली गई। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी घटना को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए अभी और डेटा की जरूरत है और अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने में एक-दो सप्ताह लग सकते हैं।

ICIMOD नेपाल और चीन के वैज्ञानिक संस्थानों के साथ मिलकर वीडियो फुटेज, सैटेलाइट तस्वीरों, हाइड्रोलॉजिकल रिकॉर्ड, भूकंपीय डेटा और दूसरे वैज्ञानिक स्रोतों का अध्ययन कर रहा है। संगठन के अनुसार, शुरुआती वीडियो और प्रभावित क्षेत्रों से प्राप्त जानकारी में बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टान का मलबा ल्हेंडे खोला में गिरने के संकेत मिले हैं। यही मलबा पानी के साथ नीचे की ओर बहा और उसने बाढ़ को सामान्य जलप्रवाह से कहीं ज्यादा खतरनाक बना दिया।

इतनी तेजी से कैसे बढ़ा पानी?

इस आपदा की सबसे खतरनाक विशेषता इसकी गति थी। सामान्य बाढ़ में पानी का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता है और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए कुछ समय मिल सकता है। लेकिन यहां नदी का रास्ता अचानक मलबे से बंद हुआ और फिर प्राकृतिक अवरोध टूटने के बाद पानी और मलबे का पूरा दबाव एक साथ नीचे की ओर आया। इस वजह से लोगों को प्रतिक्रिया करने का बहुत कम समय मिला।

ICIMOD के अनुसार, त्रिशूली नदी में कुछ जगहों पर केवल 30 मिनट में पानी का स्तर 9 मीटर तक बढ़ गया। बाढ़ अपने साथ भारी मात्रा में गाद, पत्थर और बड़े बोल्डर लेकर आई। इस तेज और भारी प्रवाह ने नदी किनारे बने पुलों, सड़कों, बिजली परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। नेपाल सरकार ने भी बताया है कि घरों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाओं को व्यापक नुकसान हुआ है।

तबाही सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं रही

भोटे कोशी और ल्हेंडे नदी प्रणाली सीमा पार होने के कारण इस प्राकृतिक आपदा का असर नेपाल के साथ-साथ चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी पड़ा। तेज मलबा-प्रवाह ने सीमा क्षेत्र में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया और नदी घाटियों में बसे इलाकों को प्रभावित किया। कई सड़कें और पुल बह गए तथा जलविद्युत और दूसरी परियोजनाएं भी क्षतिग्रस्त हुईं। इस घटना ने यह भी दिखाया कि हिमालय में प्राकृतिक आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं और एक देश में शुरू हुई आपदा कुछ ही समय में दूसरे देश के इलाकों को भी प्रभावित कर सकती है।

क्या जलवायु परिवर्तन भी इसकी वजह है?

यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिंदूकुश हिमालय यानी Hindu Kush Himalaya (HKH) क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ की स्थिति बदल रही है और कुछ पर्वतीय ढलानों में चट्टानों तथा जमी हुई जमीन यानी permafrost की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है। इन बदलावों से ग्लेशियल झीलों, हिमस्खलनों, भूस्खलनों और मलबा-प्रवाह का खतरा बढ़ सकता है।

हालांकि इस खास घटना के मामले में वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन ही सीधे तौर पर बाढ़ का कारण था। ICIMOD ने स्पष्ट किया है कि ग्लेशियर, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और पर्वतीय ढलानों में जलवायु परिवर्तन के कारण बदलाव हो रहे हैं, लेकिन इस विशेष घटना में जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका निर्धारित करने के लिए अभी और अध्ययन जरूरी है।

नेपाल के लिए आगे भी खतरा क्यों बना हुआ है?

इस घटना के बाद सबसे बड़ी चिंता सिर्फ अब तक हुई तबाही नहीं, बल्कि आगे आने वाली संभावित बाढ़ को लेकर भी है। ICIMOD ने बताया है कि ऊपरी इलाके में मलबे का अवरोध अभी भी मौजूद हो सकता है, जिससे भविष्य में दोबारा पानी जमा होने और अचानक निकलने का खतरा पैदा हो सकता है। इसी कारण अधिकारियों ने नदी के निचले इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है और संवेदनशील क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है।

नेपाल सरकार के सुरक्षा और आपदा प्रबंधन तंत्र ने राहत एवं बचाव अभियान तेज कर दिया है। सेना, पुलिस, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य एजेंसियां लापता लोगों की तलाश, घायलों के उपचार, निकासी और राहत सामग्री पहुंचाने में जुटी हैं। साथ ही नदी के जलस्तर और नीचे की ओर आने वाले संभावित बाढ़ के खतरे पर लगातार नजर रखी जा रही है।

आखिर निष्कर्ष क्या है—भूकंप या ग्लेशियर?

अब तक की वैज्ञानिक जांच के आधार पर भूकंप को इस आपदा का मुख्य कारण मानने की संभावना कमजोर हुई है। शुरुआती 4.4 तीव्रता के भूकंप की रिपोर्ट बाद के विश्लेषण में ग्लेशियल कोलैप्स से पैदा हुई भूकंपीय ऊर्जा के रूप में सामने आई। USGS के अनुसार, घटना से पैदा ऊर्जा लगभग 5.2 तीव्रता वाले भूकंप के बराबर थी, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वहां 5.2 तीव्रता का सामान्य टेक्टोनिक भूकंप आया हो।

सबसे मजबूत वैज्ञानिक परिकल्पना फिलहाल यह है कि लैंगटांग लिरुंग क्षेत्र में ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटा, उससे एवलांच और मलबा नीचे आया, मलबे ने ल्हेंडे खोला का रास्ता रोककर अस्थायी बांध बनाया और उसके टूटने के बाद पानी, कीचड़, बर्फ और चट्टानों की विनाशकारी लहर भोटे कोशी नदी में उतर गई। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में भूकंपीय गतिविधि की कोई भूमिका थी या नहीं और ग्लेशियल झील ने कहीं योगदान दिया या नहीं, इस पर वैज्ञानिक जांच अभी जारी है।

नेपाल की यह त्रासदी हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते क्रायोस्फीयर जोखिम की गंभीर चेतावनी भी है। ग्लेशियरों, बर्फ, पर्वतीय ढलानों और नदियों में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच ऐसे इलाकों में बेहतर सैटेलाइट निगरानी, नदी जलस्तर सेंसर, भूकंपीय मॉनिटरिंग, ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियों की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। ICIMOD ने भी इस घटना को सीमा-पार आपदाओं के लिए क्षेत्रीय सहयोग और बेहतर निगरानी की आवश्यकता का बड़ा उदाहरण बताया है।

यानी नेपाल में आया यह जलप्रलय महज एक सामान्य बाढ़ नहीं था। यह पहाड़, ग्लेशियर, चट्टान, नदी और अचानक बने मलबा-बांध के एक साथ टूटने से पैदा हुई cascading disaster थी। वैज्ञानिकों की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, इस बात की और स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी कि आखिर ग्लेशियर का वह हिस्सा क्यों टूटा और क्या किसी भूकंपीय गतिविधि या बदलती जलवायु ने उसे अस्थिर करने में भूमिका निभाई।

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