परिसीमन बिल पर DMK का ‘सशर्त’ समर्थन! मोदी सरकार के सामने रखीं 3 बड़ी शर्तें, बढ़ा सियासी पारा

परिसीमन बिल को लेकर मोदी सरकार दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश में है। इसी बीच DMK के संभावित समर्थन ने सियासी समीकरण को नया मोड़ दे दिया है। हालांकि, DMK ने सरकार के सामने तीन अहम शर्तें रखी हैं, जिनका सीधा संबंध दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उनके हितों की सुरक्षा से है। आखिर DMK की ये तीन शर्तें क्या हैं? क्या केंद्र सरकार इन मांगों पर सहमत होगी और क्या इसके बाद परिसीमन बिल को संसद में पर्याप्त समर्थन मिल पाएगा? जानिए परिसीमन को लेकर पूरी राजनीतिक कहानी और इसके संभावित असर।

Aug 07, 2026 - 12:09
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परिसीमन बिल पर DMK का ‘सशर्त’ समर्थन! मोदी सरकार के सामने रखीं 3 बड़ी शर्तें, बढ़ा सियासी पारा

परिसीमन बिल को लेकर केंद्र की मोदी सरकार को अब एक अहम राजनीतिक समर्थन मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक, तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी DMK परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है, लेकिन इसके लिए पार्टी ने केंद्र सरकार के सामने तीन महत्वपूर्ण शर्तें रखी हैं। सरकार इस बिल को संसद में पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है और ऐसे में DMK का रुख बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

परिसीमन का मुद्दा दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए लंबे समय से संवेदनशील राजनीतिक विषय रहा है। इसकी वजह यह है कि लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण में जनसंख्या के आधार को लेकर दक्षिणी राज्यों में यह चिंता रही है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी आशंका के चलते तमिलनाडु समेत कई दक्षिणी राज्यों की पार्टियां परिसीमन प्रक्रिया को लेकर केंद्र से स्पष्ट आश्वासन की मांग करती रही हैं।

केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बिल को आवश्यक बहुमत के साथ पारित कराने की है। संवैधानिक संशोधन से जुड़े किसी भी प्रस्ताव के लिए सामान्य विधेयक की तुलना में अधिक समर्थन की जरूरत होती है। ऐसे में सरकार अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ समर्थन को लेकर बातचीत कर रही है। इसी क्रम में DMK का संभावित समर्थन सरकार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, DMK बिना शर्त समर्थन देने के मूड में नहीं है और पार्टी ने अपने समर्थन को तीन शर्तों से जोड़ दिया है।

DMK की पहली प्रमुख शर्त यह मानी जा रही है कि परिसीमन के दौरान दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व और उनके हितों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। पार्टी का तर्क है कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए दशकों तक प्रभावी नीतियां अपनाईं। DMK चाहती है कि नए परिसीमन में ऐसे राज्यों के योगदान को नजरअंदाज न किया जाए और उनके मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

दूसरी शर्त प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाए रखने से जुड़ी बताई जा रही है। DMK की चिंता है कि यदि परिसीमन के बाद कुछ राज्यों की लोकसभा सीटें बहुत तेजी से बढ़ती हैं और दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से घट जाती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है। पार्टी चाहती है कि सीटों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में सभी राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन कायम रहे। यही मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति में भी लगातार चर्चा का विषय रहा है।

DMK की तीसरी शर्त परिसीमन की प्रक्रिया और उसके प्रभाव को लेकर स्पष्ट संवैधानिक एवं राजनीतिक आश्वासन से संबंधित है। पार्टी चाहती है कि केंद्र सरकार यह स्पष्ट करे कि परिसीमन के बाद दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक अधिकार और उनकी राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भागीदारी कमजोर नहीं होगी। DMK का मानना है कि परिसीमन केवल सीटों की संख्या तय करने की तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर राज्यों की राजनीतिक ताकत और संसद में उनके प्रभाव पर पड़ सकता है।

दरअसल, परिसीमन का सीधा संबंध लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण से है। इसका उद्देश्य बदलती जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या का संतुलन बनाना होता है। भारत में लंबे समय से लोकसभा सीटों के पुनर्विन्यास को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस चलती रही है। वर्तमान व्यवस्था में लोकसभा सीटों के राज्यवार पुनर्वितरण पर 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर रोक लगाई गई थी। यह रोक 2026 के बाद पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़ों के आधार पर होने वाले परिसीमन तक प्रभावी रहने की व्यवस्था रही है।

यही कारण है कि अब परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। दक्षिण भारत के राज्यों का कहना है कि यदि भविष्य में सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी बढ़ सकती है, जबकि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है। इस संभावित बदलाव को लेकर दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक चिंता बढ़ी है।

DMK लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण के मामले में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को परिसीमन की प्रक्रिया में दंडित नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी राज्य ने परिवार नियोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी नीतियों के जरिए जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, तो बाद में उसी आधार पर उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी नहीं होनी चाहिए। इसी वजह से DMK का समर्थन सशर्त होने की संभावना जताई जा रही है।

केंद्र सरकार के लिए DMK का समर्थन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि परिसीमन से जुड़ा संवैधानिक बदलाव व्यापक राजनीतिक सहमति की मांग करता है। सरकार को केवल सदन में संख्या जुटाने के साथ-साथ इस संवेदनशील विषय पर राज्यों और क्षेत्रीय दलों की चिंताओं को भी संबोधित करना होगा। दक्षिणी राज्यों की पार्टियां पहले से ही इस मुद्दे पर साझा रुख अपनाने की कोशिश करती रही हैं।

अगर DMK और केंद्र सरकार के बीच इन शर्तों पर सहमति बनती है, तो परिसीमन बिल को लेकर संसद में एक बड़ा राजनीतिक समीकरण बन सकता है। दूसरी ओर, यदि सरकार DMK की मांगों पर सहमत नहीं होती है, तो पार्टी का समर्थन मुश्किल हो सकता है। ऐसे में बिल को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत दिलाने के लिए सरकार को अन्य दलों से समर्थन जुटाना पड़ेगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्षी राजनीति को भी सक्रिय कर दिया है। परिसीमन के मुद्दे पर दक्षिणी राज्यों की पार्टियां केंद्र सरकार से स्पष्ट रोडमैप और संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर सकती हैं। उनका कहना है कि देश में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का संतुलन ऐसा होना चाहिए जिसमें जनसंख्या नियंत्रण के कारण किसी राज्य को राजनीतिक नुकसान न हो।

वहीं, केंद्र सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि परिसीमन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को जनसंख्या के वर्तमान वितरण के अनुरूप बनाने की संवैधानिक प्रक्रिया है। लंबे समय से सीटों के पुनर्विन्यास पर लगी रोक के बाद नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर प्रतिनिधित्व को पुनर्संतुलित करने का सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा। लेकिन चुनौती यह है कि इस प्रक्रिया को राजनीतिक रूप से स्वीकार्य और राज्यों के बीच संतुलित कैसे बनाया जाए।

फिलहाल DMK के रुख ने परिसीमन बिल को लेकर सियासी तस्वीर को और दिलचस्प बना दिया है। पार्टी का संभावित समर्थन सरकार के लिए राहत की खबर हो सकता है, लेकिन तीन शर्तों के कारण बातचीत आसान नहीं होगी। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार DMK की मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या दोनों पक्ष किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं।

परिसीमन केवल लोकसभा सीटों की संख्या बदलने का विषय नहीं है, बल्कि इसका असर आने वाले वर्षों की राष्ट्रीय राजनीति, केंद्र-राज्य संबंधों और संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। इसलिए DMK की तीन शर्तों को लेकर होने वाली बातचीत का महत्व संसद की मौजूदा राजनीति से कहीं आगे तक जा सकता है। यदि सरकार और DMK के बीच सहमति बनती है, तो यह परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम होगा; वहीं असहमति की स्थिति में यह मुद्दा दक्षिण बनाम उत्तर की राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है।

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