महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम तेज, चिदंबरम का BJP पर हमला; रिजिजू के दावे को बताया गलत

महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। किरेन रिजिजू और राहुल गांधी के बीच शुरू हुई बहस में अब पी. चिदंबरम भी शामिल हो गए हैं। चिदंबरम ने रिजिजू के तर्क को गलत बताते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी महिला आरक्षण को लागू करने में देरी कर रही है। वहीं सरकार का कहना है कि जनगणना और परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आरक्षित सीटों का निर्धारण किया जा सकता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए करीब 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। आखिर महिला आरक्षण कब लागू होगा और इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच विवाद की असली वजह क्या है? जानिए पूरी कहानी।

Aug 09, 2026 - 11:52
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महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम तेज, चिदंबरम का BJP पर हमला; रिजिजू के दावे को बताया गलत

महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच चल रही बहस में अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम भी शामिल हो गए हैं। चिदंबरम ने रिजिजू के उस तर्क को गलत बताया है जिसमें महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया को जरूरी बताया जा रहा है। कांग्रेस नेता का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी महिला आरक्षण को लागू करने में देरी कर रही है और इसके लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं का हवाला दिया जा रहा है।

महिला आरक्षण का मुद्दा भारतीय राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। संसद ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। हालांकि, कानून के प्रावधानों के मुताबिक आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ी हुई है। इसी वजह से अब इस कानून को तत्काल लागू करने की मांग और सरकार की प्रक्रिया संबंधी दलील के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ रहा है।

कांग्रेस का कहना है कि सरकार चाहे तो महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में तत्काल कदम उठा सकती है और इसके लिए 2029 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है। पार्टी के नेताओं का तर्क है कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब आरक्षण को जल्द से जल्द लागू किया जाए। विपक्ष का आरोप है कि सरकार कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर इसे टाल रही है।

इसी मुद्दे पर राहुल गांधी ने सरकार से सवाल किया है। राहुल गांधी का कहना है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए सरकार को स्पष्ट समयसीमा बतानी चाहिए। कांग्रेस लगातार यह मांग करती रही है कि महिला आरक्षण को लागू करने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और इसे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए।

राहुल गांधी और किरेन रिजिजू के बीच इस मुद्दे पर सार्वजनिक बयानबाजी के बाद पी. चिदंबरम ने भी सरकार के तर्क पर सवाल उठाया। चिदंबरम का कहना है कि महिला आरक्षण कानून में परिसीमन से जुड़ा प्रावधान होने के बावजूद सरकार के पास इसे लागू करने के रास्ते तलाशने की पर्याप्त गुंजाइश है। उनके मुताबिक सरकार की ओर से यह कहना कि आरक्षण केवल परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकता है, राजनीतिक बहस का विषय है।

चिदंबरम ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा महिला आरक्षण को लेकर प्रक्रिया को जटिल बना रही है। उनका कहना है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सरकार महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ठोस कदम उठा सकती है। कांग्रेस नेता के मुताबिक, महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का इंतजार लंबे समय तक जारी रखना उस उद्देश्य के खिलाफ है जिसके लिए कानून संसद में लाया गया था।

वहीं, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की ओर से सरकार का पक्ष रखते हुए कहा गया है कि महिला आरक्षण कानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए संविधान में तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। सरकार का तर्क है कि पहले जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होगी तथा उसी के आधार पर आरक्षित सीटों का निर्धारण किया जाएगा। इसलिए सरकार के अनुसार तुरंत आरक्षण लागू करने की मांग कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी वास्तविकताओं को नजरअंदाज करती है।

यही वह बिंदु है जिस पर सरकार और विपक्ष के बीच सबसे बड़ा मतभेद है। विपक्ष इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति से जोड़ रहा है, जबकि सरकार इसे संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का विषय बता रही है। दोनों पक्षों की दलीलों के कारण महिला आरक्षण एक बार फिर संसद और देश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था शामिल है। कानून का उद्देश्य देश की विधायी संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है।

भारत में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कुल सदस्यों की तुलना में काफी कम रहा है। यही वजह है कि महिला आरक्षण को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में देखा जाता है। समर्थकों का कहना है कि संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ने से महिलाओं से जुड़े मुद्दों को नीति निर्माण में अधिक महत्व मिल सकता है।

लेकिन आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल हैं। परिसीमन के जरिए लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण किया जाता है। महिला आरक्षण कानून में आरक्षण के लागू होने को इसी प्रक्रिया से जोड़ा गया है। यही कारण है कि सरकार का कहना है कि बिना परिसीमन के आरक्षित सीटों का अंतिम निर्धारण संभव नहीं है।

विपक्ष इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहता है कि सरकार को पहले से मौजूद लोकसभा सीटों के आधार पर भी महिला आरक्षण लागू करने का रास्ता निकालना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि अगर उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना है तो प्रक्रिया को इस तरह नहीं बनाया जाना चाहिए जिससे आरक्षण कई वर्षों तक टल जाए।

इस राजनीतिक बहस का एक बड़ा हिस्सा आगामी चुनावों से भी जुड़ा है। महिला आरक्षण लागू होने पर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में सीटों का राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। कई मौजूदा सांसद और विधायक सीटों के आरक्षण की स्थिति बदलने के कारण प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इस कानून के लागू होने का राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक होगा।

भाजपा की ओर से महिला आरक्षण को अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। पार्टी का कहना है कि दशकों से लंबित महिला आरक्षण कानून को नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद से पारित कराया। भाजपा नेताओं का तर्क है कि यह कानून महिलाओं को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

कांग्रेस इसके जवाब में कहती है कि कानून पास करना पहला कदम था, लेकिन असली उपलब्धि तभी होगी जब महिलाओं को वास्तविक रूप से आरक्षित सीटें मिलेंगी। विपक्ष का कहना है कि महिलाओं को केवल कानून का वादा नहीं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में वास्तविक प्रतिनिधित्व चाहिए।

पी. चिदंबरम के बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई है। कांग्रेस नेता ने रिजिजू के तर्क को चुनौती देकर यह संकेत दिया है कि पार्टी महिला आरक्षण के मुद्दे को आने वाले समय में बड़े राजनीतिक अभियान के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। कांग्रेस इसे महिलाओं के अधिकार और राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा बना रही है।

दूसरी ओर, सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह महिला आरक्षण कानून के तहत निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाए। यदि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया में देरी होती है तो विपक्ष को सरकार पर महिला आरक्षण टालने का आरोप लगाने का मौका मिलता रहेगा।

यह विवाद केवल कांग्रेस और भाजपा तक सीमित नहीं है। क्षेत्रीय दल भी महिला आरक्षण को लेकर अपनी-अपनी मांगें रखते रहे हैं। कुछ दलों ने महिला आरक्षण के भीतर पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए अलग प्रतिनिधित्व की मांग की है। इस कारण महिला आरक्षण का मुद्दा सामाजिक प्रतिनिधित्व और जातीय गणना जैसे बड़े राजनीतिक सवालों से भी जुड़ जाता है।

आने वाले समय में संसद में इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है। सरकार को जहां कानून के लागू होने की प्रक्रिया स्पष्ट करनी होगी, वहीं विपक्ष यह दबाव बनाएगा कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए जल्द से जल्द ठोस कदम उठाए जाएं।

कुल मिलाकर, महिला आरक्षण पर किरेन रिजिजू और राहुल गांधी के बीच शुरू हुई बहस अब पी. चिदंबरम के शामिल होने के बाद और ज्यादा राजनीतिक हो गई है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा महिला आरक्षण को लागू करने में देरी कर रही है, जबकि सरकार का कहना है कि संविधान और कानून में तय जनगणना तथा परिसीमन की प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। अब इस विवाद का केंद्र यही सवाल है कि महिला आरक्षण कब लागू होगा और क्या इसे मौजूदा लोकसभा और विधानसभा ढांचे में लागू करने का कोई रास्ता निकाला जा सकता है।

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