JSSC-CGL पर घमासान: 2014 के बाद नियुक्त कर्मचारियों का सरकार के खिलाफ मोर्चा, 2000 नौकरियों पर संकट

झारखंड में JSSC-CGL को लेकर विवाद बढ़ गया है। 2014 के बाद नियुक्त कर्मचारियों ने रांची के प्रोजेक्ट भवन के बाहर धरना देकर नौकरी बचाने की मांग की है। कर्मचारियों का दावा है कि सरकार के फैसले से करीब 2,000 नौकरियों पर संकट है और अब मामला कोर्ट तक पहुंच सकता है।

Aug 18, 2026 - 11:38
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JSSC-CGL पर घमासान: 2014 के बाद नियुक्त कर्मचारियों का सरकार के खिलाफ मोर्चा, 2000 नौकरियों पर संकट

झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार के सामने JSSC-CGL परीक्षा और इससे जुड़ी नियुक्तियों को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। सरकार की ओर से JSSC-CGL परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के बाद अब वर्ष 2014 के बाद विभिन्न परीक्षाओं के माध्यम से नियुक्त हुए JSSC-CGL कर्मचारियों ने भी मोर्चा खोल दिया है। कर्मचारियों ने अपनी नियुक्तियों को लेकर स्पष्टता और नौकरी की सुरक्षा की मांग करते हुए रांची स्थित प्रोजेक्ट भवन के बाहर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षाएं दीं, चयन प्रक्रिया पूरी की और इसके बाद उन्हें सरकारी विभागों में नियुक्ति मिली। नियुक्ति के बाद वे अपने-अपने पदों पर काम भी कर रहे हैं। ऐसे में अब परीक्षा को रद्द करने के किसी भी फैसले का असर उनकी नौकरी पर पड़ता है तो यह उनके लिए गंभीर अन्याय होगा। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पहले से नियुक्त कर्मचारियों के भविष्य को लेकर उसका क्या फैसला है।

सरकार के फैसले के खिलाफ कर्मचारियों का विरोध

JSSC-CGL से जुड़े कर्मचारियों का आरोप है कि परीक्षा को रद्द करने का फैसला आंदोलन के दबाव में लिया गया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि किसी परीक्षा या चयन प्रक्रिया को लेकर विवाद है तो उसका समाधान कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। केवल आंदोलन के दबाव में आकर पहले से नियुक्त कर्मचारियों की नौकरी पर संकट पैदा करना उचित नहीं है।

कर्मचारियों ने यह भी दावा किया कि सरकार की ओर से JSSC-CGL को रद्द करने की बात मौखिक आदेश के माध्यम से कही गई है। उनका कहना है कि केवल मौखिक आदेश के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से बाहर नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ कहा कि वे अपने अधिकारों के लिए आंदोलन जारी रखेंगे और जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे।

‘आंदोलन के दबाव में नौकरी से बाहर नहीं कर सकते’

प्रोजेक्ट भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि आंदोलन के दबाव में आकर सरकार ने JSSC-CGL को रद्द करने की बात कही है। कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से सरकारी सेवा में काम कर रहे हैं और उनकी नियुक्तियां निर्धारित चयन प्रक्रिया के जरिए हुई हैं। ऐसे में सिर्फ परीक्षा से जुड़े विवाद के कारण उनकी नौकरी समाप्त करना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।

कर्मचारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आंदोलन के दबाव में आकर किसी कर्मचारी को उसकी नौकरी से बाहर नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि सरकार उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना चाहती है तो उसे कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। कर्मचारियों ने यह भी संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर वे इस मामले को अदालत में चुनौती देंगे।

करीब 2000 कर्मचारियों की नौकरी पर संकट का दावा

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का दावा है कि सरकार के JSSC-CGL को रद्द करने के फैसले से करीब 2,000 कर्मचारियों की नौकरियों पर संकट पैदा हो सकता है। इन कर्मचारियों का कहना है कि वर्ष 2014 के बाद अलग-अलग परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं के माध्यम से जिन लोगों की नियुक्ति हुई, वे अब सरकारी विभागों में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

अगर इन नियुक्तियों को लेकर कोई प्रतिकूल फैसला लिया जाता है तो इसका सीधा असर हजारों कर्मचारियों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि कर्मचारियों ने सरकार से तत्काल स्थिति स्पष्ट करने और उनकी नियुक्तियों को सुरक्षित रखने की मांग की है।

नियुक्त कर्मचारियों का तर्क क्या है?

कर्मचारियों का मुख्य तर्क है कि उन्होंने केवल परीक्षा पास नहीं की, बल्कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र मिला और उन्होंने सरकारी सेवा में योगदान भी दिया। कई कर्मचारी लंबे समय से अपने पदों पर काम कर रहे हैं। ऐसे में नियुक्ति के बाद अचानक उनकी सेवा पर सवाल उठाना उनके लिए गंभीर चिंता का विषय है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर किसी परीक्षा में अनियमितता या कानूनी विवाद है तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। कर्मचारियों का मानना है कि किसी प्रक्रिया में विवाद होने का मतलब यह नहीं हो सकता कि उस प्रक्रिया के तहत पहले से नियुक्त हर कर्मचारी की नौकरी स्वतः समाप्त कर दी जाए।

अब अदालत में पहुंचेगा मामला

कर्मचारियों ने साफ कर दिया है कि वे इस मामले को केवल सड़क पर आंदोलन तक सीमित नहीं रखेंगे। उनका कहना है कि अगर सरकार उनके रोजगार को प्रभावित करने वाला कोई फैसला लेती है तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, नियुक्तियों की वैधता और कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा का अंतिम फैसला कानूनी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए।

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार की ओर से यदि कोई औपचारिक लिखित आदेश जारी होता है तो वे उसके खिलाफ कानूनी विकल्प तलाशेंगे। उनका मानना है कि मौखिक निर्देश के आधार पर हजारों कर्मचारियों के भविष्य का फैसला नहीं किया जा सकता।

हेमंत सोरेन सरकार के लिए बढ़ी चुनौती

JSSC-CGL कर्मचारियों के आंदोलन ने झारखंड सरकार के सामने प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती बढ़ा दी है। एक ओर सरकार को परीक्षा और चयन प्रक्रिया से जुड़े विवाद का समाधान करना है, वहीं दूसरी ओर पहले से नियुक्त कर्मचारियों के भविष्य को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाना होगा।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन कर्मचारियों के हितों का भी ध्यान रखे, जिन्होंने चयन के बाद सरकारी सेवा में योगदान दिया है। यदि दोनों पक्षों के बीच जल्द समाधान नहीं निकलता है तो यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।

फिलहाल रांची के प्रोजेक्ट भवन के बाहर कर्मचारियों का धरना जारी है और प्रदर्शनकारी अपनी नियुक्तियों को लेकर स्पष्टता तथा नौकरी की सुरक्षा की मांग पर अड़े हुए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वे अपने अधिकारों के लिए पीछे नहीं हटेंगे। वहीं, इस पूरे मामले में आगे सरकार की ओर से जारी होने वाला औपचारिक आदेश और संभावित न्यायिक कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। अब यह मामला केवल JSSC-CGL परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि करीब 2,000 कर्मचारियों के रोजगार और उनके भविष्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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