स्कूल यूनिफॉर्म में हिजाब पर रोक, इलाहाबाद HC ने खारिज की छात्रा की याचिका

हिजाब की अनुमति वाली याचिका खारिज — इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा सुकैना रिजवी की स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनने की मांग ठुकरा दी।

Aug 25, 2026 - 11:23
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स्कूल यूनिफॉर्म में हिजाब पर रोक, इलाहाबाद HC ने खारिज की छात्रा की याचिका

प्रयागराज: स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की नाबालिग छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज कर दी। छात्रा ने अपनी मां के जरिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए मांग की थी कि उसे स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए। 21 अगस्त 2026 को दिए फैसले में न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने कहा कि स्कूल का ड्रेस कोड यदि समान, निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से लागू किया गया है, तो उसका पालन सभी विद्यार्थियों के लिए जरूरी है।

क्या है पूरा मामला?

मामला टैगोर पब्लिक स्कूल, अतरसुइया, प्रयागराज की छात्रा सुकैना रिजवी से जुड़ा है। छात्रा ने इसी स्कूल से कक्षा 10वीं की पढ़ाई पूरी की थी और अब कक्षा 11वीं में प्रवेश लेना चाहती थी। उसने अपनी मां के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर स्कूल अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी कि उसे निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए। छात्रा का कहना था कि वह कक्षा 6वीं से 10वीं तक स्कूल में सिर पर स्कार्फ पहनती रही थी और उस दौरान स्कूल ने इस पर आपत्ति नहीं जताई थी।

छात्रा ने क्या दलील दी?

याचिका में छात्रा की ओर से मुख्य तर्क यह था कि हेडस्कार्फ पहनना उसके लिए धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत पहचान से जुड़ा हुआ है। उसने यह भी कहा कि वह स्कूल की यूनिफॉर्म को बदलना नहीं चाहती, बल्कि निर्धारित ड्रेस के साथ सिर पर स्कार्फ पहनना चाहती है। उसके अनुसार, पहले कई वर्षों तक स्कूल में उसे स्कार्फ पहनने की अनुमति मिली थी, इसलिए कक्षा 11वीं में प्रवेश के समय अचानक इस पर रोक लगाना उचित नहीं है। छात्रा ने अपने दावे को संविधान में मिले मौलिक अधिकारों से भी जोड़ा था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने छात्रा की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि केवल यह दावा कर देना पर्याप्त नहीं है कि हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा है। अदालत के सामने ऐसा पर्याप्त तथ्यात्मक और कानूनी आधार नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो सके कि मुस्लिम महिला के लिए सिर पर हेडस्कार्फ पहनना ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसके बिना उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित हो जाएगी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर विभिन्न हाईकोर्ट के फैसलों में हेडस्कार्फ को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया है।

स्कूल की यूनिफॉर्म पर अदालत का जोर

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्कूल यूनिफॉर्म के महत्व को भी रेखांकित किया। अदालत के मुताबिक निर्धारित यूनिफॉर्म का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों के पहनावे को नियंत्रित करना नहीं होता, बल्कि यह अनुशासन, समानता और संस्थान की पहचान बनाए रखने में भी भूमिका निभाती है। एक समान ड्रेस कोड अलग-अलग धर्म और समुदाय से आने वाले विद्यार्थियों के बीच बाहरी भेद को कम करने तथा शिक्षण संस्थान में धर्म-निरपेक्ष वातावरण बनाए रखने में मदद करता है।

क्या पहले स्कार्फ पहनने की अनुमति मिलने से अधिकार बन गया?

छात्रा की ओर से यह भी महत्वपूर्ण दलील थी कि वह कक्षा 6वीं से 10वीं तक उसी स्कूल में स्कार्फ पहनती रही और स्कूल ने उस समय उसे नहीं रोका। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछली कक्षाओं में स्कूल द्वारा आपत्ति नहीं किए जाने से छात्रा को भविष्य में भी उसी तरह स्कार्फ पहनने का कोई स्थायी या कानूनी अधिकार हासिल नहीं हो जाता। अदालत ने माना कि पहले स्कूल की ओर से आपत्ति न करना उसकी निष्क्रियता, नीति लागू न करने, संकोच या किसी अन्य वजह से हो सकता है। इससे स्कूल की ड्रेस नीति को बाद में लागू करने पर रोक नहीं लगती।

तस्वीरों का भी अदालत ने किया उल्लेख

अदालत ने स्कूल की अलग-अलग कक्षाओं से जुड़ी तस्वीरों का भी अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को छोड़कर अन्य किसी छात्रा ने हेडस्कार्फ नहीं पहना था। अदालत ने विशेष रूप से यह भी उल्लेख किया कि छात्रा के ही धार्मिक समुदाय से आने वाली अन्य छात्राएं भी निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म में थीं और हेडस्कार्फ नहीं पहन रही थीं। इस तथ्य को भी अदालत ने मामले के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।

स्कूल का क्या कहना था?

स्कूल की ओर से दलील दी गई कि टैगोर पब्लिक स्कूल एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त और CBSE से संबद्ध शिक्षण संस्थान है, जहां विद्यार्थियों के लिए एक निर्धारित यूनिफॉर्म लागू है। स्कूल प्रशासन का तर्क था कि यदि निर्धारित ड्रेस के अलावा किसी एक विद्यार्थी को अलग से अतिरिक्त पहनावा रखने की अनुमति दी जाती है, तो इससे समान ड्रेस कोड और उसके प्रशासनिक पालन पर असर पड़ सकता है। स्कूल ने यह भी बताया कि उसी धार्मिक समुदाय की अन्य छात्राएं भी निर्धारित यूनिफॉर्म का पालन कर रही हैं।

ड्रेस कोड कब मान्य माना जाएगा?

हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि स्कूल द्वारा तय यूनिफॉर्म का पालन तभी मजबूती से लागू किया जा सकता है, जब ड्रेस कोड समान रूप से लागू हो, उसमें भेदभाव न हो और उसका उद्देश्य वास्तविक रूप से अनुशासन तथा संस्थागत पहचान बनाए रखना हो। ऐसी स्थिति में स्कूल प्रबंधन को अपनी यूनिफॉर्म तय करने और उसे लागू करने का प्राथमिक अधिकार है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल चाहे तो भविष्य में अपनी ड्रेस नीति में बदलाव कर सकता है, लेकिन किसी छात्र द्वारा अदालत से अलग छूट की मांग करना स्वतः अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कर्नाटक हिजाब मामले का भी संदर्भ

फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के हिजाब संबंधी फैसले का भी संदर्भ सामने आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली न्यायिक मिसाल माना, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर पहले विभाजित फैसला आ चुका है और मामला व्यापक रूप से अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है। इसके बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने मौजूद तथ्यों और पूर्व न्यायिक दृष्टिकोण के आधार पर उसे अलग निष्कर्ष निकालने का पर्याप्त आधार नहीं मिला।

कोर्ट ने आखिर में क्या फैसला दिया?

सभी दलीलों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुकैना रिजवी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि छात्रा हेडस्कार्फ को इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य या कानूनी सामग्री पेश नहीं कर सकी। साथ ही, स्कूल की यूनिफॉर्म नीति को समान और गैर-भेदभावपूर्ण माना गया। इसलिए अदालत ने स्कूल को छात्रा के लिए निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग हेडस्कार्फ की अनुमति देने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।

यह फैसला स्कूलों में ड्रेस कोड, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहनावे के अधिकार के बीच संतुलन से जुड़े सवालों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि यह फैसला इस विशेष मामले और उसके सामने रखे गए तथ्यों पर आधारित है, लेकिन अदालत की टिप्पणियां यह स्पष्ट करती हैं कि किसी धार्मिक पहनावे को संवैधानिक संरक्षण दिलाने के लिए केवल धार्मिक आस्था का दावा पर्याप्त नहीं होगा; उसके आवश्यक धार्मिक अभ्यास होने का ठोस आधार भी अदालत के सामने रखना होगा।

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