55 साल से किराया नहीं, अब सीतापुर कांग्रेस कार्यालय खाली करने का आदेश; हाई कोर्ट ने भी नहीं दी राहत

सीतापुर में 55 साल से किराया नहीं देने के आरोप के बाद कांग्रेस कार्यालय खाली करने का विवाद बढ़ गया है। नगर पालिका के आदेश को कांग्रेस ने हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन अदालत ने फिलहाल बेदखली पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। मामले में अब आगे की कानूनी सुनवाई होगी।

Aug 18, 2026 - 11:52
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55 साल से किराया नहीं, अब सीतापुर कांग्रेस कार्यालय खाली करने का आदेश; हाई कोर्ट ने भी नहीं दी राहत

उत्तर प्रदेश के सीतापुर में कांग्रेस के पुराने कार्यालय को लेकर विवाद अब अदालत तक पहुंच गया है। नगर पालिका परिषद ने कांग्रेस को कार्यालय खाली करने के लिए 15 दिन का समय दिया था, जिसके खिलाफ कांग्रेस की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर कर बेदखली आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई। हालांकि, हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। मामला शहर के ऐतिहासिक घंटाघर भवन की पहली मंजिल पर संचालित हो रहे कांग्रेस कार्यालय और उससे जुड़ी जमीन के अधिकार को लेकर है।

विवादित संपत्ति टैमसेन गंज इलाके में स्थित प्लॉट नंबर 244/1 से जुड़ी है। नगर पालिका का कहना है कि यह जमीन नजूल संपत्ति है और कांग्रेस के पास इस जमीन के वैध आवंटन का कोई ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। नगर पालिका के अनुसार, लंबे समय से वहां कांग्रेस कार्यालय संचालित होने के बावजूद किराये का भुगतान भी नहीं किया गया।

कांग्रेस की ओर से अदालत में दावा किया गया कि उसका इस संपत्ति पर कब्जा वर्ष 1971 से है और तत्कालीन व्यवस्था के तहत कार्यालय के लिए जगह उपलब्ध कराई गई थी। कांग्रेस ने अपने दावे के समर्थन में वर्ष 1971 में 320 रुपये किराये के भुगतान की रसीद भी पेश की। हालांकि, अदालत के सामने ऐसा कोई वैध अलॉटमेंट ऑर्डर, किरायानामा या अन्य दस्तावेज पेश नहीं किया जा सका, जिससे यह स्पष्ट रूप से साबित हो सके कि संपत्ति कांग्रेस कमेटी को कानूनी रूप से आवंटित की गई थी।

मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने की। कांग्रेस कमेटी, सीतापुर की ओर से दाखिल रिट याचिका में नगर पालिका परिषद, सीतापुर के कार्यकारी अधिकारी (प्रभारी) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें संबंधित रिकॉर्ड से याचिकाकर्ताओं के नाम हटाने और संपत्ति से बेदखल करने का निर्देश दिया गया था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी सरकारी जमीन पर लंबे समय तक कब्जा बना रहने मात्र से वह कब्जा कानूनी नहीं हो जाता। यदि किसी व्यक्ति या संस्था को सरकारी संपत्ति का वैध अधिकार या आवंटन प्राप्त है तो उसके समर्थन में संबंधित दस्तावेज होना जरूरी है। अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई अलॉटमेंट ऑर्डर या अन्य ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर पाए, जिससे संपत्ति के कानूनी आवंटन की पुष्टि हो सके।

55 साल से किराया नहीं देने का दावा

नगर पालिका की ओर से यह भी कहा गया कि कांग्रेस की ओर से आखिरी बार 6 फरवरी 1971 को 320 रुपये जमा किए गए थे। इसके बाद लंबे समय तक कोई किराया जमा किए जाने का रिकॉर्ड नगर पालिका के पास नहीं मिला। इसी आधार पर नगर पालिका ने कांग्रेस के कब्जे को वैध किरायेदारी मानने से इनकार किया।

कांग्रेस के नगर अध्यक्ष की ओर से नगर पालिका को दिए गए जवाब में दावा किया गया था कि वर्ष 1972 से किरायेदारी चली आ रही है और तत्कालीन सरकार ने कार्यालय के लिए स्थान आवंटित किया था। लेकिन नगर पालिका ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। अधिकारियों का कहना था कि नगर पालिका के रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है जो कांग्रेस के इस दावे की पुष्टि करता हो।

नजूल जमीन पर कब्जे का विवाद

इस मामले में ‘नजूल’ जमीन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। नजूल भूमि आम तौर पर ऐसी सरकारी जमीन होती है जिसका प्रबंधन सरकारी नियमों के तहत किया जाता है। राज्य सरकार ने अदालत में कांग्रेस की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि संबंधित संपत्ति नजूल भूमि है और उस पर बिना वैध आवंटन के कब्जा कानूनी अधिकार नहीं देता।

सरकार और नगर पालिका का तर्क था कि किसी संस्था का लंबे समय तक किसी सरकारी संपत्ति का इस्तेमाल करना अपने आप में स्वामित्व या वैध कब्जे का प्रमाण नहीं हो सकता। इसके लिए वैध आवंटन, पट्टा, किरायानामा या संबंधित सरकारी रिकॉर्ड जरूरी है।

कांग्रेस को हाई कोर्ट से नहीं मिली अंतरिम राहत

कांग्रेस की ओर से अदालत से मांग की गई थी कि नगर पालिका के बेदखली आदेश पर रोक लगाई जाए, ताकि कार्यालय को तत्काल खाली न करना पड़े। लेकिन हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने फिलहाल याचिकाकर्ताओं की ओर से मांगी गई बेदखली पर रोक स्वीकार नहीं की है।

अदालत ने प्रतिवादियों को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। वहीं, याचिकाकर्ताओं को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। यानी मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया अभी जारी रहेगी और अंतिम रूप से सभी पक्षों के दावों तथा दस्तावेजों पर अदालत का फैसला आगे की सुनवाई में हो सकता है।

घंटाघर की ऐतिहासिक इमारत में चलता है कार्यालय

सीतापुर शहर कांग्रेस कमेटी का कार्यालय शहर की ऐतिहासिक घंटाघर इमारत के ऊपरी हिस्से में संचालित होने की बात सामने आई है। इसी संपत्ति को लेकर नगर पालिका और कांग्रेस के बीच विवाद चल रहा है। नगर पालिका ने संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड की जांच के बाद कांग्रेस को कार्यालय खाली करने का नोटिस जारी किया था।

नगर पालिका की ओर से जारी नोटिस के बाद कांग्रेस ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि कार्यालय दशकों से इसी स्थान पर संचालित हो रहा है और उसे तत्कालीन सरकार की ओर से जगह उपलब्ध कराई गई थी। कांग्रेस ने पुराने कब्जे और किराये की रसीद को अपने पक्ष का आधार बनाया, लेकिन नगर पालिका के रिकॉर्ड में वैध आवंटन से जुड़ा दस्तावेज नहीं मिलने के कारण उसका दावा स्वीकार नहीं किया गया।

दशकों पुराना कब्जा बना कानूनी अधिकार नहीं

इस मामले में हाई कोर्ट की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने साफ किया कि केवल लंबे समय तक किसी सरकारी संपत्ति पर कब्जा रहने से कब्जे को स्वतः कानूनी मान्यता नहीं मिल जाती। सरकारी जमीन के संबंध में वैध अधिकार साबित करने के लिए संबंधित दस्तावेज जरूरी होते हैं।

कांग्रेस के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अदालत के सामने ऐसा दस्तावेज पेश करे जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित संपत्ति उसे विधिवत आवंटित की गई थी या उसके पास वहां रहने का वैध अधिकार था। दूसरी ओर, नगर पालिका और राज्य सरकार का पक्ष है कि ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है और इसलिए संपत्ति पर कांग्रेस का कब्जा वैध नहीं माना जा सकता।

फिलहाल हाई कोर्ट ने बेदखली आदेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, मामले की अंतिम सुनवाई और आगे की कानूनी प्रक्रिया अभी बाकी है। इसलिए सीतापुर कांग्रेस कार्यालय को लेकर विवाद का अंतिम नतीजा आगे की न्यायिक कार्यवाही और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

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