न ट्रेनिंग, न मोटरबोट... 10वीं ड्रॉपआउट युवक ने असम बाढ़ में बचाईं करीब 2,000 जिंदगियां
असम की भीषण बाढ़ के बीच 25 वर्षीय 10वीं ड्रॉपआउट श्रवण कुमार ने बिना किसी रेस्क्यू ट्रेनिंग और बिना मोटरबोट के अपनी पारंपरिक 'तुलुंगा नाव' के सहारे करीब 2,000 लोगों की जान बचाकर मिसाल कायम की। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ पांच गांवों में बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और मरीजों को सुरक्षित बाहर निकाला। दूसरी ओर, राज्य में बाढ़ की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है और प्रभावित लोगों की संख्या घटकर 1.78 लाख रह गई है। इस रिपोर्ट में जानिए श्रवण कुमार की साहसिक कहानी, असम बाढ़ के ताजा हालात और राहत कार्यों से जुड़े सभी बड़े अपडेट।
असम में आई भीषण बाढ़ के बीच एक साधारण युवक की असाधारण बहादुरी की कहानी पूरे देश में प्रेरणा बनकर सामने आई है। 25 वर्षीय श्रवण कुमार, जो केवल 10वीं तक पढ़ाई कर सके और जिनके पास न कोई औपचारिक रेस्क्यू ट्रेनिंग थी और न ही मोटरबोट, उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर करीब 2,000 लोगों की जान बचाई। पारंपरिक लकड़ी की नाव ‘तुलुंगा नाव’ और नदी की गहरी समझ के सहारे उन्होंने अपने दोस्तों के साथ पांच गांवों में लगातार राहत एवं बचाव अभियान चलाया। इस दौरान बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया।
असम में बाढ़ की स्थिति शनिवार को कुछ हद तक सुधरी। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के अनुसार, बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या घटकर 1.78 लाख रह गई है। हालांकि प्रभावित जिलों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। राहत की बात यह रही कि पिछले 24 घंटों में बाढ़ से किसी नई मौत की सूचना नहीं मिली और बाढ़ से मरने वालों की कुल संख्या 82 पर स्थिर रही।
श्रवण कुमार असम के शिवसागर जिले के बिहुबोर इलाके के रहने वाले हैं। हर साल मानसून के दौरान वह दिखो (Dikhow) नदी के किनारे बहकर आने वाली लकड़ियां इकट्ठा करने जाते हैं। यही लकड़ियां उनके परिवार के लिए ईंधन और आय का महत्वपूर्ण साधन हैं, क्योंकि उनका परिवार एलपीजी सिलेंडर का उपयोग नहीं करता। 19 जुलाई की सुबह करीब 3 बजे जब श्रवण नदी किनारे पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि नदी में बड़े-बड़े पेड़ों के तने असामान्य गति से बह रहे हैं। बचपन से नदी के किनारे रहने के कारण उन्होंने तुरंत समझ लिया कि बड़ा खतरा आने वाला है।
सूरज निकलने तक उनकी आशंका सच साबित हो गई। बाढ़ का पानी तेजी से गांवों में घुसने लगा और पूरा इलाका जलमग्न होने लगा। श्रवण का अपना घर भी इस आपदा से नहीं बच पाया। उनके घर में भी पानी भर गया और उनकी मां तथा भाई को सामान बचाने के लिए ऊंचे स्थान पर ले जाना पड़ा। ऐसे समय में उनके पास अपने परिवार की मदद करने का पूरा कारण था।
लेकिन श्रवण ने अपने परिवार की बजाय पहले दूसरे लोगों की जान बचाने का फैसला किया। उन्होंने कहा, "अगर मैं अपने घर को बचाने चला जाता, तो बाकी लोगों को बचाने वाला कोई नहीं होता।" यही निर्णय उन्हें एक साधारण युवक से असाधारण नायक बना गया।
श्रवण केवल 10वीं कक्षा तक पढ़े हैं और उन्होंने कभी किसी प्रकार का औपचारिक आपदा राहत या बचाव प्रशिक्षण नहीं लिया। उनके पास मोटरबोट भी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी पारंपरिक लकड़ी की नाव ‘तुलुंगा नाव’ और नदी के अनुभव के आधार पर अपने दोस्तों के साथ राहत अभियान शुरू किया। उस समय नदी का बहाव इतना तेज था कि कई अनुभवी नाविक भी उसमें उतरने से डर रहे थे।
19 जुलाई की सुबह लगभग 10 बजे से शुरू हुआ यह अभियान पूरी रात और अगले दिन तक लगातार चलता रहा। श्रवण और उनके साथियों ने जलमग्न घरों से छोटे बच्चों को सुरक्षित निकाला, चलने-फिरने में असमर्थ बुजुर्गों को कंधों और नाव के सहारे बाहर निकाला, गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया और गंभीर मरीजों को भी बाढ़ से बाहर निकाला।
श्रवण ने बताया कि कई लोग अपने घरों की छतों और यहां तक कि सीलिंग (छत के अंदर बने हिस्से) में फंसे हुए थे क्योंकि पानी लगातार ऊपर चढ़ रहा था। उन्होंने कहा, "हमें लोगों को सीलिंग के अंदर से निकालना पड़ा। रात के समय पूरी तरह अंधेरे में काम करना बेहद डरावना था।" इसके बावजूद उन्होंने और उनकी टीम ने बिना रुके राहत कार्य जारी रखा।
बचाव अभियान के दौरान सबसे बड़ी चुनौती तेज बहाव के साथ बह रही विशाल लकड़ियां थीं, जिनसे नाव के पलटने का लगातार खतरा बना हुआ था। फिर भी श्रवण और उनके साथी एक गांव से दूसरे गांव, एक घर से दूसरे घर तक लगातार जाते रहे। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का काम जारी रखा।
श्रवण के अनुसार, इस अभियान के दौरान उन्होंने और उनकी टीम ने पांच गांवों में करीब 2,000 लोगों को सुरक्षित निकाला। इनमें बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग शामिल थे। स्थानीय लोगों ने उनके साहस और निस्वार्थ सेवा की जमकर सराहना की और उन्हें बाढ़ का असली नायक बताया।
19 जुलाई को आई इस भीषण बाढ़ ने शिवसागर जिले के नाजिरा सह-उपमंडल में भारी तबाही मचाई। कई गांव पूरी तरह जलमग्न हो गए, सड़कें बह गईं और बिजली तथा संचार सेवाएं ठप हो गईं। हालात इतने खराब हो गए कि कई परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए घरों की छतों पर शरण लेनी पड़ी।
इस बीच ASDMA के अनुसार, असम में अभी भी 349 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं। बाढ़ का असर गोलाघाट, शिवसागर, चराइदेव, बजाली, धेमाजी, सोनितपुर और जोरहाट जिलों में देखा गया है। इनमें चराइदेव सबसे अधिक प्रभावित जिला है, जहां 75,199 लोग प्रभावित हुए हैं। इसके बाद शिवसागर का स्थान है, जहां 58,824 लोग बाढ़ से प्रभावित हैं।
एक दिन पहले यानी शुक्रवार को राज्य के पांच जिलों में लगभग 1.92 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित थे। शनिवार तक प्रभावित लोगों की संख्या घटकर 1.78 लाख हो गई, जिससे राहत कार्यों के सकारात्मक परिणाम दिखाई दिए। हालांकि प्रशासन ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है क्योंकि कई नदियां अब भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं।
ASDMA ने बताया कि दिखो नदी शिवसागर में और धनसिरी नदी गोलाघाट जिले के नुमालीगढ़ क्षेत्र में अभी भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। प्रशासन इन क्षेत्रों पर लगातार नजर बनाए हुए है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए बचाव दलों को तैयार रखा गया है।
राज्य में फिलहाल 44 राहत शिविर संचालित किए जा रहे हैं, जहां लगभग 15,000 विस्थापित लोगों को आश्रय दिया गया है। इसके अलावा 17 राहत वितरण केंद्र भी सक्रिय हैं, जहां 5,569 लोगों को भोजन, पेयजल और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि श्रवण कुमार जैसे युवाओं की बहादुरी और सामाजिक जिम्मेदारी आपदा के समय मानवता की सबसे बड़ी मिसाल होती है। बिना किसी प्रशिक्षण और आधुनिक संसाधनों के उन्होंने जो साहस दिखाया, वह न केवल असम बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि संकट की घड़ी में साहस, अनुभव और दूसरों की मदद करने का जज्बा किसी भी तकनीक से बड़ा साबित हो सकता है।
फिलहाल असम में बाढ़ की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, लेकिन कई क्षेत्रों में राहत और पुनर्वास कार्य अभी भी जारी हैं। प्रशासन, आपदा राहत एजेंसियां और स्थानीय स्वयंसेवक मिलकर प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंचाने में जुटे हैं। वहीं श्रवण कुमार और उनकी टीम की बहादुरी की कहानी पूरे देश में मानवीय संवेदनाओं और निस्वार्थ सेवा का एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है।
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