छात्र आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, नाबालिगों की रिहाई के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने CJP छात्र आंदोलन को शांतिपूर्ण बताते हुए बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले नाबालिग प्रदर्शनकारियों की तत्काल रिहाई और कथित अत्यधिक बल प्रयोग की स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के छात्र आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा कि छात्रों का प्रदर्शन पहली नजर में पूरी तरह शांतिपूर्ण दिखाई देता है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि यदि किसी भी स्तर पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया है, तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी मांगों और असहमति को शांतिपूर्ण तरीके से रखने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन इस दौरान बल प्रयोग हमेशा आवश्यकता और कानून की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। यदि इन सीमाओं का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी प्रदर्शनकारियों को लेकर भी अहम निर्देश जारी किए, जो 18 वर्ष से कम आयु के हैं। अदालत ने कहा कि जिन नाबालिग प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें तत्काल प्रभाव से रिहा किया जाए। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में बच्चों और किशोरों के अधिकारों की विशेष सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और उनके साथ कानून के अनुरूप संवेदनशील व्यवहार किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पहली नजर में पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता दिखाई देती है। कोर्ट का मानना है कि केवल स्वतंत्र जांच के माध्यम से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पुलिस कार्रवाई परिस्थितियों के अनुरूप थी या कहीं आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया। अदालत ने कहा कि निष्पक्ष जांच से सभी पक्षों के दावों और आरोपों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन संभव होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई से जुड़े दिशा-निर्देशों की समीक्षा की जरूरत पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि वर्ष 2018 में बनाए गए दिशा-निर्देशों की अब समीक्षा करने का समय आ गया है। न्यायालय ने पूछा कि क्या 2018 के नियम वर्ष 2026 की परिस्थितियों में भी उतने ही प्रभावी हैं या उन्हें समय के अनुसार संशोधित करने की आवश्यकता है। अदालत का मानना है कि प्रदर्शन शुरू होते ही पुलिस के लिए स्पष्ट और आधुनिक प्रोटोकॉल तत्काल लागू हो सकें, इसके लिए नियमों को अपडेट किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश को देखते हुए भीड़ नियंत्रण, प्रदर्शन प्रबंधन और बल प्रयोग से जुड़े दिशा-निर्देशों में आधुनिक सुधार किए जाने चाहिए। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में भ्रम की स्थिति कम होगी और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों दोनों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार भी छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान करती है। उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है या हिंसा में शामिल होता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना भी आवश्यक है।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को यह भी बताया कि आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं में 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान पुलिस बल को भी नुकसान उठाना पड़ा और इस पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र जांच का उद्देश्य केवल प्रदर्शनकारियों के आरोपों की जांच करना नहीं होगा, बल्कि पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों की भी समान रूप से निष्पक्ष जांच की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच का दायरा दोनों पक्षों के दावों को शामिल करेगा, ताकि सच्चाई पूरी तरह सामने आ सके और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।
मामले की सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 3 अगस्त निर्धारित की। अदालत ने संकेत दिया कि अगली सुनवाई में जांच की प्रगति, पुलिस कार्रवाई, नाबालिग प्रदर्शनकारियों की रिहाई और दिशा-निर्देशों की समीक्षा से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार किया जाएगा।
यह मामला केवल एक छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं माना जा रहा है, बल्कि भविष्य में देशभर में होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन तय करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की जवाबदेही से जुड़े मामलों में एक अहम न्यायिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
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