नेपाल में फिर मंडराया बाढ़ का खतरा, 'लेक टू' क्यों बनी चिंता की वजह? जानें कितना बड़ा है जोखिम

नेपाल के रसुवा में ‘लेक टू’ ग्लेशियल झील में बढ़ते पानी से GLOF का खतरा बढ़ा, अधिकारियों ने बचावकर्मियों और जलविद्युत परियोजनाओं को अलर्ट किया।

Sep 02, 2026 - 19:06
Updated: 2 days ago
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नेपाल में फिर मंडराया बाढ़ का खतरा, 'लेक टू' क्यों बनी चिंता की वजह? जानें कितना बड़ा है जोखिम

नेपाल में विनाशकारी बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी तबाही के बाद अब एक और संभावित खतरे ने प्रशासन और बचाव एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। चीन की सीमा से लगे रसुवा क्षेत्र में मौजूद एक ग्लेशियल लेक, जिसे अधिकारियों ने ‘लेक टू’ के नाम से चिन्हित किया है, में पानी जमा होने की जानकारी सामने आई है। नेपाली अधिकारियों ने चीन के जल संसाधन मंत्रालय से मिले आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि झील में पानी लगातार भर रहा था और इसके चलते इसके अचानक फटने यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा पैदा हो गया था।

बाढ़ पूर्वानुमान विभाग के प्रमुख और वरिष्ठ हाइड्रोलॉजिस्ट बिनोद पराजुली ने बताया कि चीनी आंकड़ों के अनुसार 31 अगस्त तक इस ग्लेशियल लेक में अनुमानित 6.5 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका था। उनके मुताबिक झील काफी भर चुकी थी और इसलिए इसके फटने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। इसी वजह से बचावकर्मियों और खासकर जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में काम कर रहे कर्मचारियों को अतिरिक्त सतर्क रहने की सलाह दी गई।

'लेक टू' को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?

ग्लेशियल लेक सामान्य तौर पर ग्लेशियरों के पिघलने से जमा हुए पानी से बनती हैं। कई बार इनके सामने बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे से बनी प्राकृतिक दीवार होती है। अगर यह प्राकृतिक बांध कमजोर हो जाए, टूट जाए या पानी का दबाव उसकी क्षमता से अधिक हो जाए तो झील का पानी अचानक नीचे की ओर निकल सकता है। इस तरह की घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है।

रसुवा में जिस ‘लेक टू’ को लेकर चिंता जताई गई, वह उसी व्यापक हिमालयी आपदा क्षेत्र के ऊपरी हिस्से में स्थित है जहां हालिया बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़े घटनाक्रम ने भारी तबाही मचाई। इस इलाके में पहले ही बड़े पैमाने पर चट्टान, बर्फ और मलबे के बहाव से नदियों का प्रवाह प्रभावित हुआ है। अधिकारियों को आशंका थी कि अगर ऊपर बनी झील का प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो नीचे के इलाकों में अचानक अतिरिक्त पानी और मलबे का सैलाब पहुंच सकता है।

बिनोद पराजुली ने बचावकर्मियों को क्यों किया अलर्ट?

बाढ़ पूर्वानुमान विभाग के प्रमुख बिनोद पराजुली ने खास तौर पर बचावकर्मियों को सावधानी बरतने को कहा था। उनकी चिंता केवल नदी किनारे बसे गांवों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जलविद्युत परियोजनाओं में चल रहे राहत एवं बचाव अभियान भी इसमें शामिल थे।

हालिया बाढ़ से नेपाल की कई जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। कुछ जगहों पर कर्मचारी और श्रमिक सुरंगों के अंदर फंसे होने की आशंका है। ऐसे में अगर झील अचानक टूटती है तो पानी और मलबे का तेज बहाव पहले से प्रभावित इलाकों में पहुंच सकता है और राहत अभियान में जुटे लोगों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर सकता है। इसी कारण बचावकर्मियों को नदी और सुरंग क्षेत्रों में काम करते समय लगातार स्थिति पर नजर रखने को कहा गया।

झील कब फटेगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल

अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ग्लेशियल लेक के भरने और उसके संभावित फटने का सटीक समय बताना बेहद मुश्किल होता है। किसी झील में पानी लगातार बढ़ रहा हो तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि वह तुरंत टूट जाएगी। प्राकृतिक बांध की मजबूती, पानी का दबाव, तापमान, बारिश, आसपास के ग्लेशियरों की गतिविधि और मलबे की संरचना जैसे कई कारक इसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

इसीलिए अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि ‘लेक टू’ कितने समय में फट सकती है। उनका जोर लगातार निगरानी और किसी भी संभावित बदलाव की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करने पर रहा। नेपाल के अधिकारियों ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों, यात्रियों और बचावकर्मियों से नदी किनारे और अन्य जोखिम वाले क्षेत्रों से दूर रहने की अपील भी की थी।

पहले भी बनी थी ऐसी झील और बढ़ा था खतरा

नेपाल-चीन सीमा के इस इलाके में हालिया आपदा के दौरान मलबे ने नदी के प्रवाह को रोककर एक अस्थायी झील बना दी थी। सैटेलाइट तस्वीरों और चीनी अधिकारियों से मिली जानकारी के आधार पर नेपाली अधिकारियों ने इसकी निगरानी की। पानी बढ़ने के साथ यह चिंता बढ़ी कि अगर प्राकृतिक मलबे का बांध अचानक टूट गया तो दूसरी बार तेज बाढ़ आ सकती है।

रिपोर्टों के अनुसार उस नई बनी झील में पानी जमा होने के बाद उसका स्तर बढ़ता गया और एक समय पानी प्राकृतिक अवरोध के ऊपर से बहने लगा। बाद में विशेषज्ञों ने बताया कि पानी का प्राकृतिक रूप से बाहर निकलना शुरू होने के बाद अचानक झील फटने का तत्काल जोखिम कम हुआ। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक झील पूरी तरह सुरक्षित तरीके से खाली नहीं हो जाती, तब तक क्षेत्र में निगरानी जरूरी बनी रहती है।

चीन से मिले आंकड़े क्यों महत्वपूर्ण हैं?

इस पूरे मामले में चीन से मिले आंकड़ों की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधित ग्लेशियर और ऊंचाई वाले कई इलाके चीन के तिब्बत क्षेत्र में या सीमा के करीब स्थित हैं। नेपाल के पास हर जगह प्रत्यक्ष निगरानी करना आसान नहीं है। ऊंचे पहाड़, कठिन मौसम और खराब पहुंच के कारण जमीन पर लगे सेंसर या निगरानी उपकरण सीमित हो सकते हैं।

ऐसे में सैटेलाइट तस्वीरें, हवाई सर्वेक्षण और चीन से मिलने वाली जल एवं ग्लेशियर संबंधी जानकारी नेपाल के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। हालिया आपदा के बाद नेपाल ने चीन के साथ ग्लेशियर और बाढ़ संबंधी डेटा साझा करने तथा शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

रियल टाइम मॉनिटरिंग की कमी भी बड़ी चुनौती

बिनोद पराजुली पहले ही बता चुके हैं कि हिमालय के ऐसे संवेदनशील इलाकों में किसी झील के फटने से पहले वास्तविक समय की जानकारी हासिल करना बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक कई निगरानी उपकरण हालिया बाढ़ में बह गए और इस कारण शुरुआती संकेत हासिल करना मुश्किल हुआ। ऐसे स्थानों पर कैमरे, सेंसर और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम होने से झील के जलस्तर और प्राकृतिक बांध में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखी जा सकती है।

यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी बाढ़ बेहद तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकती है। ऊपर पहाड़ों में होने वाली घटना और नीचे बसे गांवों तक उसके असर पहुंचने के बीच समय बहुत कम हो सकता है। ऐसे में कुछ मिनट या कुछ घंटे पहले मिलने वाली चेतावनी भी लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाया ग्लेशियल लेक का खतरा

वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों के व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है और कई इलाकों में नई या बड़ी ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं। इन झीलों के सामने मौजूद प्राकृतिक बांध अगर कमजोर हैं तो भविष्य में GLOF का खतरा बढ़ सकता है।

नेपाल में हालिया तबाही ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है। वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलनों के मुताबिक 26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ के पीछे बड़े पैमाने पर बर्फ और चट्टानों के अचानक नीचे आने की प्रक्रिया शामिल थी। इसके बाद नदियों और घाटियों में पानी तथा मलबे का प्रवाह कई गुना बढ़ गया।

जलविद्युत परियोजनाओं के लिए क्यों गंभीर खतरा?

नेपाल में जलविद्युत परियोजनाएं मुख्य रूप से पर्वतीय और नदी घाटी वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। यही क्षेत्र ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक बाढ़ के लिहाज से भी संवेदनशील हैं। हालिया आपदा में कई जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा और कई सुरंगों में श्रमिकों के फंसे होने की आशंका सामने आई।

अगर ऊपर की ओर मौजूद कोई ग्लेशियल लेक अचानक टूटती है तो पानी के साथ बड़ी मात्रा में पत्थर और मलबा भी नीचे आ सकता है। इससे सड़कें, पुल, बिजलीघर, सुरंगों के प्रवेश द्वार और नदी किनारे बने अन्य ढांचे प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए अधिकारियों ने जलविद्युत परियोजनाओं में तैनात बचावकर्मियों को विशेष सावधानी बरतने के लिए कहा था।

अभी क्या किया जा रहा है?

नेपाल में अधिकारियों ने ऊपरी क्षेत्रों में मौजूद झीलों और नदी के जलस्तर पर नजर रखने के लिए निगरानी बढ़ाई है। सैटेलाइट तस्वीरों और हवाई सर्वेक्षण से स्थिति का आकलन किया जा रहा है। साथ ही निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को नदी किनारे नहीं जाने और आधिकारिक चेतावनियों पर ध्यान देने को कहा गया है। कुछ संवेदनशील स्थानों पर कैमरे और सेंसर लगाने की योजना भी सामने आई है, ताकि भविष्य में ऐसे खतरों का पता जल्द लगाया जा सके।

हालांकि बाद के आकलनों में कुछ झीलों का पानी प्राकृतिक रूप से निकलना शुरू होने के बाद तत्काल फटने का जोखिम कम बताया गया था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि खतरा पूरी तरह खत्म मानने से पहले लगातार निगरानी जरूरी है। खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्र पहले ही एक बड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना कर चुका हो।

नेपाल के लिए यह सिर्फ एक झील का खतरा नहीं

‘लेक टू’ को लेकर उठी चिंता नेपाल के सामने मौजूद व्यापक हिमालयी आपदा जोखिम की याद दिलाती है। एक तरफ ग्लेशियरों में बदलाव और बढ़ता तापमान है, दूसरी तरफ कमजोर पर्वतीय ढलानें और तेजी से बदलता नदी तंत्र। इसके साथ सड़क, सुरंग और जलविद्युत जैसी विकास परियोजनाओं का विस्तार भी हो रहा है।

ऐसे में वैज्ञानिकों और आपदा विशेषज्ञों की चिंता केवल यह जानने तक सीमित नहीं है कि कोई झील कब फटेगी। असली चुनौती ऐसी घटनाओं से पहले जोखिम की पहचान करना, रियल-टाइम निगरानी स्थापित करना, स्थानीय लोगों को तुरंत चेतावनी देना और संवेदनशील इलाकों से समय रहते लोगों को सुरक्षित निकालना है।

नेपाल में हालिया तबाही के बाद ‘लेक टू’ पर नजर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक बड़ी आपदा के बाद दूसरा प्राकृतिक घटनाक्रम पहले से कमजोर क्षेत्र में और बड़ा संकट पैदा कर सकता है। इसलिए फिलहाल सबसे अहम हथियार है—लगातार निगरानी, सटीक वैज्ञानिक आंकड़े और समय पर चेतावनी।

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